बिन बुलाए भी तो महफिल में आ ही जाता हूँ,
गुनगुनाने के बहाने मैं ढूँढ लाता हूँ ।
तू भी उठ, अपने पैरों पर अभी खडा हो जा,
जैसे गिर जाउँ तो मैं खुद को ही उठाता हूँ ।
खेत बेताब हैं आबाद होने को लेकिन,
मैं सदा हाट से बासी अनाज खाता हूँ ।
इसी तूफ़ाँ ने उजाड़ा है आशियाँ मेरा,
फिर भी मैं रोज हवाओं के गीत गाता हूँ ।
मेरे अन्दर तू उभरती है शिखरों की तरह,
और मैं बादल की तरह रोज तुझ पे छाता हूँ ।
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दरअसल मैं बुलाने पर भी महफिलों में कम ही आता जाता हूँ ।
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