Thursday, February 14, 2013

ग़ज़ल : बिन बुलाए भी ...


बिन बुलाए भी तो महफिल में आ ही जाता हूँ,
गुनगुनाने के बहाने मैं ढूँढ लाता हूँ ।

तू भी उठ, अपने पैरों पर अभी खडा हो जा,
जैसे गिर जाउँ तो मैं खुद को ही उठाता हूँ ।

खेत बेताब हैं आबाद होने को लेकिन,
मैं सदा हाट से बासी अनाज खाता हूँ ।

इसी तूफ़ाँ ने उजाड़ा है आशियाँ मेरा,
फिर भी मैं रोज हवाओं के गीत गाता हूँ ।

मेरे अन्दर तू उभरती है शिखरों की तरह,
और मैं बादल की तरह रोज तुझ पे छाता हूँ ।

1 comment:

Krishna Singh Pela said...

दरअसल मैं बुलाने पर भी महफिलों में कम ही आता जाता हूँ ।